6/29/2016

बेवफ़ाई

  

करके बेवफाई भी तू खुश रहे
हर गम हर जुदाई में तू खुश रहे
रब न दे तुझे कोई सज़ा
मेरी मौत के दिन भी तू खुश रहे ....

मेरे आँसू  तेरी मुस्कान बन जाए
कोई मिले और तेरी जान बन जाए
मेरे टूटे ख़्वाबों से तेरी ज़िन्दगी बन जाए
मेरी यादों के निशां न तेरी परछाई बन जाए 
....

मैं तन्हा  ही सही ,
   तेरी ज़िन्दगी मेला बन जाए
मेरा साथ छूटा सही
   तुझे साथ दूजा मिल जाए
मेरे वादे अधूरे सही
  तेरे वादों को पंख मिल जाए
मेरे जख्म नासूर सही
   तेरे जख्मों  को मरहम मिल जाए 
....

तुझसे मिली मुझे बेवफ़ाई  तो क्या ?
मिले न सिला तुझे तेरी बेवफाई का 
....
जा देती हूँ दुआ मैं , तुझे इस जहां में
बे-पनाह मोहब्बत मिल जाए  
....
 
बे-पनाह मोहब्बत मिल जाए  .... !!

वैशाली एस बियाणी 

4 / 8 / 2016
14 . 0 1 

6/09/2016

एकला चलो रे

"एकला चलो रे"
"एकला चलो रे"

बहुत ही सार्थक पंक्ति है...

जीवन में हम अकेले ही आए हैं और जाना भी भी अकेले ही है.. कुछ समय जीवन गुजराने के बाद महसूस होता है कि हम जी भी अकेले ही रहे हैं.  ऊपरी तौर पर शायद कुछ लोग हमारे साथ दिखाई देते हैं किन्तु अंदरूनी तौर पर गहराई से देखे तो हम अकेले ही है. साथ देने वाले लोग सिर्फ वक्ति है.. वक्त आने पर, वक्त रहने पर.. इत्यादि.
       कहते है - खून का रिश्ता सबसे मजबूत होता है, पर देखा जाए तो यही सबसे कमजोर होता है क्योंकि यही टूटता है सबसे पहले. स्वार्थ से भरे होते हैं ये रिश्ते... कोई भी रिश्ता एक नाम देने भर से कमजोर हो जाता है, उसमें तेरा मेरा और अन्य बहुत सी बातें बीच आ जाती हैं.  अपना इस दुनिया में कोइ नही होता है.
'हम स्वयं अपने लिए ही हो जाए वो भी बडी बात है.. '
किन्तु क्या हम इस सच को स्वीकार कर पाते हैं ??

    आज के जमाने का सोशल मीडिया सच में बहुत अच्छी बात है, कम से कम आप अपनी भावनाओ को दिल खोलकर  जाहिर कर सकते हैं. कोई तो होगा जो देखेगा, पढेगा.. वर्ना कौन सुनना चाहता है आपके विचारो को ?? और हम कहे भी तो किससे? आपका या आपकी बात का बिना आकलन किये या उस पर अपने विचार व्यक्त किए, कौन सुनेगा? यहाँ तो हर बात पर लोग, बात के पीछे क्या कारण होगा, उसमे ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं.  हर बात चीर - फाड़ कर देखा जाता है, कुछ और मायने निकाल कर बात का बतंगड़ बनाया जाता है..
     मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है - हमने बचपन से यही पढा, सीखा और जीया है.  ऐसे में अकेला चलना कहाँ तक मुमकिन हो पाएगा ? आज के दौर में अकेले रहने से मतलब क्या सचमुच पूर्णतः अकेले रहना है या मतलब परस्त हो कर जीने से है? या खुद को वक्ति बना लेने से है ?

"अकेला चना भाड़ नही फोड़ सकता "

दोनो ही बातें सही है किन्तु विरोधाभास उत्पन्न करती  हैं.

" चाहती हूँ अकेली रहना
  पर कोई रहने नही देता !
   कभी यादें चली आती हैं
  कभी कोई आवाज है देता !!
मानतीं हूँ, अकेली हूँ
नितांत अकेली
जानती हूँ
नही है कोई
वाहिद सहारा मेरा
पूर्णता अपूर्णता के
मंझधार में
गोते लगा रही हूँ..
आज इसको, कल उसको
पुकारती जा रही हूँ
न जाने क्यूँ बस
जिये जा रही हूँ..
जिये जा रही हूँ... "

मेरे विचारों पर सहमत /असहमत होने का पूर्ण हक है आपको,  किंतु कृपया एक बार judgemental हुए बिना, मेरे लेखन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें, मुझे खुशी होगी !!

आभार
वैशाली
9/6 /16
11.30 am
 

   

5/02/2016

बदलते चेहरे

नकाबो से भरे चेहरे 
वक्त को देख बदलते हैं 
स्वार्थ की खातिर वो, 
अपनो को भी ठगते है ! 

सही गलत का भेद कहां 
खुद को सच समझते हैं 
स्वार्थ की खातिर वो, 
सारे रिश्ते बुनते है....!! 

बेवकूफ़ो की जमात के 
संवेदना का दम भरते हैं, 
समानता के लिए अब
हम ईश्वर का रूख करते हैं.. 

मिले वहाँ से न्याय हमें 
आस्था इस पर रखते हैं 
इसी विश्वास पर हम
हाथ जोड़ नमन  करते हैं....!! 


नए अनुभव से शिक्षित.. 

वैशाली 
30/04/2016
6.55 pm


4/23/2016

वो बेटी

"वो बेटी"
जब बनने लगे पक्ष घरों में
पक्षपात हो ही जाता है
दो-चार बच्चों के बीच 
एक कुछ ज्यादा भाता है !
लडकों की श्रेणी ही अलग
सबसे ऊंचा ओहदा पाता है
बेटियों के बीच भी अक्सर
ऊंच - नीच का होता नाता है !
ऊंचे बैठे नीचे कहां देख पाते
नीचे से सब साफ नजर आता है !
बातें जो दिल में घर कर गयी
कहाँ वो निकल पाती हैं??
वो बेटी तो बेचारी
खून का घूंट पीकर रह जाती है !
एक गलती भी उसकी
सज़ा है बन जाती
भर्रायी सी आवाज में,
अश्क दबा जाती है.. !
वक्त-बेेवक्त की छींटाकशी
उसको परेशान कर जाती
चार लोगों के बीच फिर भी
वो मज़ाक बनायी जाती है
कर दरकिनार उसको
सबकी मौज हो जाती है !
सूने आंगन सा,
वो मन अपना पाती है
मौन खडे़ माँ-बाप को देख
दिल टूटता, आँखें सूखी जाती हैं !
हर बार उसी आँगन में आकर
वो बेटी फिर भी मुस्काती है
वो बेटी फिर भी मुस्काती है... !!
"वैशाली "
23/04/2016
शाम.. ४.००

11/28/2015

पलायनवादी

महत्वाकांक्षा की गर्त में डूब गई
अहं की दीवारों के बीच रह गई
टीसती है मुझे हार खुद की
बस  ...
बिन आवाज़ रोते सीत्कारते रह गई
मालूम था मुझे हूँ पलायनवादी मैं
क्या तुम्हारा जाताना जरूरी था ?
थोड़ी बहुत इज़्ज़त थी खुद की
खुद की नज़र से गिराना जरूरी था ??
टूटते ही आज शान की दीवार
मैं भी टूट गई  हूँ
जुड़ सकूगीं फिर न मैं कभी
इतनी बिखर गई  हूँ
डूब जाऊँगी इन अंधेरों  में कही
कोई किरण की आस भी नही
आज स्वीकार करती हूँ मैं
हाँ ! पलायनवादी हूँ,कोई वीर लड़ाक नही
जानती हूँ न हो सकूगीं सफल कभी
इसीलिए लौट रही  वापस अभी
न करुँगी अब उजालों  की तलाश
अँधेरों  में बीतेंगे बाकी  के दिन सभी
न कोई दिलासा न उम्मीद काम आएगी
दिन रात बस  अब यूँही गुजर जाएगी
मुझे बस अब इसी तरह जीना है
पल पल अब आँसुओ  को पीना है
हर उम्मीद पर धोखा खायी हूँ
अपनों से बस खंजर ही पाई हूँ
अब मेरा जीना थोड़ा आसान हो जायेगा
अपना है ही नहीं , जो बे-ईमान हो जायेगा
अपने दर्द से फुर्सत है ही कहाँ
जो औरो के नश्तर वार कर जाएंगे
बहुत चढ़ ली चढ़ाई मैंने
अब ज़िन्दगी ढ़लान पर है
बस उतरते जाना है
अनंत में खो जाना है  !!

VAISSHALI .......
25/11/2015
3.30 noon

असफल

सपने देख उसे पाने की चाह  में
न जाने कहाँ से कहाँ तक आ गए
दर दर भटकते रहे, किनारों की तलाश में
मारे मारे फिरे  .....
सब कुछ लुटा , खाली  हाथ वापस आ गए
कभी इस राह , कभी उस राह
हर राह में मंजिल तलाशी
बस अहं बढ़ता गया और
बढ़ती गई अंदरूनी ख़ामोशी
कमज़ोर नीव पर
कब इमारत  बनती है ??
दर दर भटकने से
कब मंजिल मिलती है ??
पता न था सब पीछे से मुस्काएँगे
बेमतलब कंकर को पहाड़ बताएँगे
जब चलोगे नयी राह खोजने
वे ही चौराहे पर भटकाएँगे
उठाएँगे उंगलियाँ तुम्हारी ओर
हर इलज़ाम होगा तुम्हारे सर
न जाने क्या क्या उपमाएँ मिलेंगी
अंत में सिर्फ 'असफल 'कहलाओगे  !!

VAISSHALI......
25/11/2015
1.30 NOON


11/25/2015

दर्द - ए -ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी ......
सबकुछ खोकर बहुत कुछ पाया तुझसे
आँसू , बैचेनी , दर्द और अकेलापन
यही तो असली विरासत है  ......
जो खोया वो मेरा था ही कहाँ
होता तो क्या यूँही खो जाता ??
इतना सब पा कर भी  ...
रास नहीं आती ज़िन्दगी
यूँ दूर दूर जाती है कि
पास नहीं आती ज़िन्दगी
खामोश लब आँसू भरे नैना
दर्द है पास  .....
फिर क्यूँ डराती है ज़िन्दगी ??
गम के साये हैं,अँधेरे घिर आये हैं
रोशनी से घबराती है ज़िन्दगी
अहं की दीवार बनाई
.... "मैं "को ये रास आई 
इस दलदल में फंस गयी ज़िन्दगी

इतना सब पाने की चाह  में
जाने कहाँ खो गयी ज़िन्दगी  !!

Vaisshali ......
24/11/2015
12.30 noon

9/27/2015

क्यूँ ??

क्यूँ भटकता है कोई ?
    अपनी जमीन छोड़ कर
    गैरों की राह में पनाह में

क्यूँ गिरता है कोई ?
   दूजे की बाँह में
   अपनो के आगोश से 

क्यूँ ढूंढता है कोई ?
    कांधा, सहारा के लिए
    खुद बेसहारा होकर

क्यूँ करता है आशा कोई ?
    रुमाल की, आँसू देने वाले से
    खुद उस से ही दुखी होकर

ऐ दिल मान जा कहा ....
    मत कर गैरो पे विश्वास
    यहाँ अपने ही अपने न हुए  !!


------- वैशाली -------
26/09/2015
2:35 Mid-Ni8

    
 

9/26/2015

दिल और दीप जलते हैं .....

बैरी सजन मुझे तड़पाए
सपनो को कुचल कर मुस्काए
जब जब सँजू मैं उसके लिए
जालिम तब तब आँख फिराए
रात खड़ी मैं लिए होंठो पे गीत
आए न साजन रैना यूँ ही गयी बीत
सताकर अनजान बनना है उनकी अदा
झट से बुरा मान जाते है वो सदा
कैसे समझाऊ कितना दुःख होता है मुझे
काश ! कसमें -वादे निभाने आते तुझे
कितना रोकूँ पर दिल कहाँ मानता है
छलक जाते है आँसू दिल कट जाता है
बस यूँ ही मुझे जीना होगा
खून के घूँट पीना होगा
कदर करोगे मेरे जाने के बाद
क्या करोगे जब आएगी मेरी याद
मेरी दीवानगी तुझको सताएगी
तेरी बेरुखी तेरा दिल जलाएगी
तब पछता  के कुछ न पाओगे
यादों में फिर जीना सीख जाओगे
खोकर लोग फिर कहाँ मिलते हैं
बस फिर दिल और दीप  जलते हैं  … !!

----- वैशाली ------
26 /09 /2015
11. 00 AM

9/23/2015

घुटन

भीड़ में घुटती हूँ मैं 
अकेले रहने दो मुझे 
कुछ नहीं भाता मुझको 
चाहे भूखा रहने दो मुझे 
जल - वायु है साथी मेरे

कोई साथ न रास आता मुझे 
जी करता उड़ जाऊ इस जग से 
करूँ विचरण मैं स्वच्छंद नभ में 
पर्वतों की ऊंचाई नाप लूँ 
चाँद पर एक जहाँ बसा लूँ 
काश ! कि यह हो पाता 
रहूँ वहाँ, जहाँ न कोई हो आता
अकेले आए हैं, है अकेले जाना
कुछ बरस साथ सिर्फ अपना पा जाना
बाकी दुनिया माया - जाल है 
अपने
सिर्फ कहने को
असलियत में हम कंगाल है !!
VAISSHALI 
14 /10 /2015 
11 :55 AM