12/08/2012

Avismarniya Anubhav !! :)

एक सपना सा पूरा हुआ. मुस्कुराते हुए चेहरे , कुछ शरमाते हुए चेहरे  अजीब सी ख़ुशी दे रहे थे . पढने की कोशिश कर रही थी , चेहरों पे आते जाते भावो को . पर एक तरफ़ा यह भावनाओ का प्रवाह मन को विचलित सा कर रहा था. मेरे आगे उजाला था और उनके आगे अन्धकार. समझ से परे था कि यह क्षण में क्या महसूस किया जा सकता है ? दुःख, उनके लिए जो इस स्तिथि में है  या शुक्रिया भगवान का कि हम इस परिस्तिथि में  नहीं है .  कितने प्यारे है वोह . मिलकर लगा कि हमने इस ज़िन्दगी में क्या संघर्ष किया है ? कहीं न कहीं जा कर हमारा संघर्ष पूरा होता है. परन्तु उनका तो पूरा जीवन ही संघर्षमय है जो कभी शायद ही पूरा होगा , किन्तु विषाद कि एक रेखा भी उनके चेहरे पर नहीं है .  कितनी सरलता है उनके स्वाभाव में . वहां जा कर सच में अपना दुख भूल सी गयी  और लगा कि वास्तव में मेरे जीवन में दुःख है भी..?? क्या हम स्वयं दुखो का निर्माण तो नहीं कर लेते ?  सच ही कहा है किसी ने ... " दुनिया में कितना दुःख है मेरा तो सबसे कम है " . 


    कितनी अजीब बात है न , लोग सभी को अपने तराजू से तौलते है , क्यों तौलते है दूसरो को ? मुझसे पुछा किसी ने - " कितने पैसे मिलते है इस काम के ? " मुझे हँसी आ गयी , उलटी रीत कब से चल पड़ी , मुझे तो पता ही नहीं चला कि आजकल सीखने वालो को पैसे मिलते है और सिखाने वाला देता है . जो मुझे दुनिया का सबसे बड़ा पाठ सिखा रहे हो उनसे जाकर पैसे माँगना  धिक्कार होगा . यह बात कुछ लोग कभी नहीं समझ सकते.

                      शुक्रिया तो सचमुच है भगवान् का कि इस जनम में कुछ क्षण तो ऐसे दिए जब में सचमुच उनके काम आ सकी जिन्हें वाकई जरुरत है .  अप्रत्यक्ष रूप से तो यह सिलसिला काफी दिनों से चल रहा था. पर जो प्रत्यक्ष अनुभव मिला वोह बहुत ही अदभुत रहा . ख़ुशी इस बात की है कि उन्हें भी मेरा साथ पसंद आया जिसके लिए में उनकी शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने मुझे पसंद करने लायक समझा.  में सचमुच काफी सालो से इसी  प्रयास में थी परन्तु कुछ मौका नहीं मिल रहा था, अब जब मिला है तो संपूर्ण रूप से अपने अंदर समां लेना चाहती हूँ . एक घंटा कहाँ बीत गया पता ही नहीं चला . कितनी  आशांएं है उनके हृद्य  में , कितने सपने है , कितना कुछ प् लेने की छह है, कुछ न कुछ बनना  चाहते है वो .  उठाना अच्छा  तो नहीं लग रहा था , किन्तु उन्हीके लिए आगे के काम के लिए वहां से उठाना जरूरी था. उठी तो सही पर एक वादे के साथ कि हम जल्द ही मिलेंगे और मिलते रहेंगे. 

              यह  दिन वैसे तो में कभी भुला नहीं पाती , पर शादी के सालगिरह के दिन यह अनुभव सचमुच जीवन का एक अविस्मरनीय अनुभव बन गया . :)

10/07/2012

रिश्ता




तुमको पाया तो सबकुछ  पाया मैंने
इसी जनम में सातो जनम बिताया मैंने !

कोई दर्द  एक पल छू  ले मुझको
ले दवा  हाथ तुझको पाया मैंने !!

चल  दिए हम बस साथ तुम्हारे 
सदा तुम्हारा हाथ अपने हाथो  में पाया मैंने 

जो चले आये राहो में कांटे मेरे
चुभते काँटो पे तुम्हे  फूल बिछाते पाया मैंने

प्यार की राहो में बंधन निभाते चले
सच्चा हमसफ़र तुम में पाया मैंने

प्यार तो कर कोई करता होगा
निभाते है कैसे तुमसे जाना मैंने
सातो जनम का प्यार तुमसे पाया मैंने
तुम्हे पाया तो सबकुछ पाया मैंने  !!!!!


7/31/2012

संतान का जन्म : फ़र्ज़ या क़र्ज़

हमारी सृष्टि  की रचना कुछ इस तरह से हुई है कि यह निरंतर चलती ही रहती है। संसार में मनुष्य का जन्म और मृत्यु दोनों ही भगवन के हाथ में है। हर इंसान कुछ मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों के साथ जन्म लेता है।
माता- जन्मदायिनी और पिता- जन्मदाता कहलाते है।

             हर माता-पिता बहुत ही हर्ष व अकांक्षाओ  के साथ अपनी संतान को जन्म देते है। बहुत प्रेम के साथ संतान का लालन-पालन करते है। इस तरह जो भी इस संसार में जन्म लेते है वह अपनी  मर्ज़ी से नहीं वरन अपने माता-पिता की इच्छा का परिणाम होते है। जिसे माता-पिता अपनी मर्ज़ी से,अपने हिसाब से,अपनी ख़ुशी के लिए  इस संसार में लाते है ! उनके लालन -पालन में सिर्फ प्रेम नहीं होता, साथ होती है उनकी आकांक्षाएँ , महत्वाकांक्षाएँ, अधिकार और संतान के कर्तव्य।( यह अधिकार व् कर्तव्य अलिखित है, बरसो से बस माने हुए है, अतः अधिकांशतः एकतरफा से है।) सोचने वाली बात यह है कि  जो काम हम अपनी ख़ुशी से ख़ुशी के लिए करते हो तो उस काम पर आपका कोई क़र्ज़ होगा?  संतान के जन्म के बाद उनसा लालन-पालन करना माता-पिता का नैतिक फ़र्ज़ है/ कर्तव्य है। कहा जाता है की माता-पिता सा कोई निःस्वार्थी नही  इस संसार में , किन्तु गहराई  से समझी जाये तो असत्य सी प्रतीत होगी। दूसरे  शब्दों  में वे अत्यंत स्वार्थी से प्रतीत होंगे।

        अधिकांशतः  संतान को जन्म देने के पीछे भी बहुत से कारण  होते है। सिर्फ ख़ुशी के लिए उनका जन्म नहीं होता। अपना व  परिवार का नाम चलने वाला/वाली कोई होना चाहिए , कारोबार को सम्हालने या आगे बढ़ने के लिए......... इत्यादि। जब संतान को जन्म देने के पीछे खुद का कोई कारण  हो तो उन्हें निःस्वार्थी कैसे कहा जाये ....... ?? इतना ही नहीं जब संतान को बड़ा किया जाता है तब उसे माता-पिता के प्रति कर्तव्य  सिखाया जाता है  और आशा की जाती है की वह उन कर्तव्यों  पर खरा भी उतरे। साथ ही साथ हर माता-पिता अपनी संतान को अपनी आकांक्षाओ और महत्वाकांक्षाओ को पूरा करने का जरिया भी मान बैठते है। तो क्या यह भी निस्वार्थता  की निशानी है?

                   भारत एक ऐसा देश है जहाँ बच्चों  को क्या 'नहीं' करना यह तो अच्छे से और बार-बार  सिखाया जाता है परन्तु क्या करना चाहिए सही मायनो में , इस पर कम ध्यान दिया जाता है। माता-पिता अपनी संतान का सही ढंग से लालन-पालन करके अपना फ़र्ज़ बहुत अच्छे से निर्वाह करते है पर क्या कभी वह यह सोचते है कि  उनका यह फ़र्ज़ उनकी अपनी संतान के लिए क़र्ज़ में बदल रहा है। जीवन में बच्चा एक बार तो जरूर यह सोचता होगा कि  क्या हमारा जन्म सिर्फ कर्तव्य पूर्ति  के लिए हुआ है? क्यूँ भूल जाते है माता-पिता, कि  जन्म तो उन्होंने अपनी मर्ज़ी से दिया है परन्तु उनका फ़र्ज़ सिर्फ संतान के आत्मनिर्भर होने तक है, आगे की ज़िन्दगी के लिए संतान खुद जिम्मेदार है। जब आपने जिम्मेदार बनाया है तो जिम्मेदारी निभाने तो दीजिये पूरी तौर पर। बचपन से जिस तरह के माहौल और घर के अन्दर के वातावरण में बच्चा बड़ा होगा उसके स्वाभाव में वही झलकेगा और अपनों के प्रति उसका व्यवहार भी उसी अनुकूल होगा।

                              माता-पिता का फ़र्ज़ बच्चो के लिए क़र्ज़ क्यों बने ? कहीं ऐसा तो नहीं चूँकि आप इस संसार में लाये है तो 'ता-उम्र' उन्हें आपके ही अनुकूल चलना होगा? क्यूँ? माता-पिता की आकांक्षाओ का भार बच्चा क्यों उठाएँ ? सिर्फ इसलिये कि  आप उसके जन्म के जिम्मेदार है या परंपरा ही यही चली आ रही है? अक्सर सुनने में आता है कि -" तुम्हे पाल-पोसकर क्या इसलिये बड़ा किया है......??" तो किस लिए किया है? अर्थात  पाला-पोसा किसी कारण  से है, निःस्वार्थ नहीं पला गया है।

                                  हमारे देश में जहाँ रिश्ते फ़र्ज़ कम क़र्ज़ ज्यादा जैसे होते है जिन्हें आपको निभाना ही होता है, समाज का भी बहुत दबाव होता है, वहीँ पश्चिमी देशो में माता-पिता की जिम्मेदारी, संतान के अपने आत्मनिर्भर हो जाने की उम्र तक ही होती है। सही मायनो में फ़र्ज़ अदायगी वहीँ निभाई जाती है। भारत में न सिर्फ अपनी संतान बल्कि दूसरे की संतान, जो आपकी संतान की साथी है, उस से भी आकांक्षा राखी जाती है कि  उसका, आपके प्रति भी फ़र्ज़ है। यह कहाँ तक तर्कसंगत है?  माता-पिता के प्रति फ़र्ज़ ( क़र्ज़) समझ  भी आता है किन्तु साथी के माता-पिता के प्रति क़र्ज़ (फ़र्ज़ ) क्यों।..??

                                  नैतिकता , मानवता, और प्रेम को अलग रख कर सोचा जाये तो इस संसार में कोई भी व्यक्ति किसी के भी प्रति बाध्य नहीं है। सामाजिक रूप से  हमारा फ़र्ज़ क्या हो वह हमें खुद तय करना चाहिए।  कितनी अजीब बात है कि  हमे बचपन से समाज, माता-पिता, भाई-बहन  इत्यादि के प्रति क्या फ़र्ज़ है, बार बार समझाया और सिखाया जाता है , वहीँ हमारा देश के प्रति, देश के कानून के प्रति और देश से जो पाया है उसे लौटने  के प्रति क्या फ़र्ज़ है? इत्यादि अति महत्वपूर्ण बातों  को गौण समझा जाता है, इस बारे में सिखाने या समझाने की जरुरत समझी ही नहीं जाती।

                     संतान माता-पिता की परछाई हो सकता है किन्तु कर्ज़दार नहीं। फ़र्ज़- प्रेम ,लगाव, अपनापन, रिश्ते, नैतिकता, मानवता के दायरे में आकर निभाए जा सकते है किन्तु वह संतान के लिए क़र्ज़ रुपी नहीं हो सकते कि  उन्हें मजबूरन निभाना ही पड़े। संतान आकांक्षा और महत्वाकांक्षा पूरी करने वाली मशीन नहीं, उसकी अपनी सोच और समझ और इच्छाएँ  है, यह हमे अब  सीख लेना चाहिए।  मनुष्य एक सामाजिक  प्राणी जरूर है किन्तु समाज मनुष्यों से बना है, न कि  मनुष्य समाज से , यह कभी नहीं भूलना चाहिए। (फ़र्ज़- एक नैतिक जिम्मेदारी है तो वहीँ क़र्ज़- मांग कर , वापस करने के इरादे के साथ लिया जाता है।)

                        संतान के आत्मनिर्भर होने के साथ ही माता-पिता का फ़र्ज़ बच्चो के प्रति समाप्त हो जाता है। आगे संतान अपनी ज़िन्दगी और अपने परिवार के प्रति खुद जिम्मेदार होता है। संतान के परिवार ( पत्नी-बच्चो ) के प्रति माता-पिता की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। इसलिए उनसे इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। हर माता-पिता का फ़र्ज़ सिर्फ और सिर्फ अपनी संतान के प्रति होता है।

                                फ़र्ज़ और क़र्ज़ की इस कश्मकश में हर इंसान फसाँ  हुआ है, अंतत : जीत, उसकी बचपन से की गयी परवरिश, उसकी अपनी सोच और माहौल की, होती है। माता-पिता के प्रति आपके फ़र्ज़ को आपको किस तरह निभाना है वह प्रत्येक इंसान को स्वयं समझना होगा। किसी क़र्ज़ की तरह या माता-पिता के प्रति असीम प्रेम , लगाव और उनके प्रति नैतिक जिम्मेदारी की तरह ?  माता-पिता को भी बच्चो को प्यार और सिर्फ प्यार देकर , एक अलग व्यक्तित्व की तरह बड़ा करना चाहिए न कि अपनी  संतान होने के कारण  स्वार्थ  की सोच के साथ।

** यह सोच पूर्णतः लेखिका की अपनी है, इस विषय पर आपके विचारो का स्वागत है, कृपया अपने विचार जरूर भेजे।**


7/24/2012

स्वागत करें खुशियों का --


माँ एक ऐसा शब्द है , जहाँ से दुनिया की शुरुआत होती है। वह न सिर्फ बच्चो को जन्म देती है, लालन -पालन करती है, वरन उनकी आँखों में ख्वाब और दुनिया की हकीकत एक साथ दिखाती है, और खुद बच्चो को लेकर हज़ारों सपने बुनती है। उन्ही सपनो में से सबसे बड़ा सपना होता है बच्चो की शादी का, खासकर अपने बेटे की शादी का।

हर एक माँ बेटे की शादी का सपना जिस ललक से देखती है, वही बहु का नाम सामने आते ही हज़ारो  सवालो में खुद को घिरा पाती है। भूल जाती है खुद के बहु होने के समय की विवशता को और याद रह जाता है तो बस अपने अधिकार घर पर और बेटे पर। जहाँ बेटी के लिए ममता और प्यार झलकता है तो वहीँ दूसरे  की बेटी के लिए कठोरता,  अज़ीब  है औरतो  का यह दोहरा स्वरुप और काबिल-ए-तारीफ़ बात तो यह है की वह इन दोनों स्वरूपों को बख़ूबी  निभाती भी है।

                 जब बेटे की शादी कर बहु आती है तो उसका स्वागत बहुत ही जोर-शोरो से किया जाता है, आरती उतारी जाती है, मंगल गीत गाये जाते है, बड़े प्यार से सर पे हाथ रख ढेरो आशीर्वाद दिए जाते है ( यह अलग बात है की अधिकाश आशीर्वाद अपने बेटे या परिवार के लिए ही होते है ). यह सब कुछ ही दिनों में भुला दिया जाता है और माँ, सास बनकर रह जाती है और बहु कर्तव्य निभाने वाली कठपुतली।

            कहा जाता है की सास और बहु की अमूमन नहीं पटती है। जब माँ का ही स्वरुप बदल जाये और बेटी को बदलना पड़े तो पटेगी कैसे? जहाँ माँ और परिवार वाले अपनी बेटी के लिए बड़ा घराना, खुले विचार वाले लोग खोजते है, जहाँ बेटी को राजयोग मिले, काम न करना पड़े (नाजो से जो पली है) , क्या कभी सोचते है कि  जिसे वह  बहु बना कर लाये है वह भी किसी की नाजो से पली लाडली है, उसके भी माँ-पिताजी ने इसी  तरह के सपने देखें होंगे। एक तरफ जहाँ वे चाहते है की उनकी बेटी का उसकी ससुराल में राज़ चले, खुश होते है जब बेटी की हर एक तमन्ना उनका जमाई पूरा करता है वहीँ दूसरी तरफ बेटा करे तो उसे  ' जोरू का गुलाम' कहना नहीं चूकती माँ भी। इतना दुभात  क्यों ?

           बहु से आशा की जाती है कि  वह आकर जल्द ही ससुराल वालो के रंग में रंग जाये और न जाने ऐसी ही कितनी आशाए  राखी जाती है।  हमे बचपन से सिखाया गया है कि 'आशा ही निराशा को जन्म देती है।' पर अपना वक़्त आने पर हम यह सब भूल जाते है।  हम खुद भेद-भाव करते है पर वही बहु करे तो गलत ? खुद को बदलने से साफ़ इनकार और बहु आये तो पूरी बदल जाये। यह कहाँ का इन्साफ है ? फिर कहते है कि -' बहु, बेटी नहीं हो सकती।' हां ! क्यों और कैसे होगी वह आपकी बेटी ? क्या कभी सच्चे दिल सेमन है आपने उससे बेटी ? किया है बेटियों सा व्यवहार ? क्या अपनाया है उसको, उसके अपने वजूद के साथ ?  एक उपनाम( सरनेम) जिसे लेकर वह जन्म लेती है जो उसकी पहचान होता है, वह तक तो उस से छीन  लिया जाता है, घर बदलकर ससुराल हो जाता है ( यह तुम्हारा घर नहीं ससुराल है- कहा जाता है ), सब कुछ तो छिना - छिना  सा लगता है शादी होते ही तो कैसे कोई हो जायेगा अचानक से अपना सा ?  क्या उससे पुछा जाता है कि  -' बेटी तुम क्या चाहती हो ?'  नहीं ! बस बताया जाता है कि  हमारी यह चाहत है और तुम्हे यह करना है।क्यों करे वह आपकी चाहतो को दिल से पूरा जबकि उसकी अपनी चाहतो का गला घोंट दिया गया है।? कैसे कर पायेगी वह पूरा मनन से जबकि उसका मनन अधुरा है।  बड़े अरमानो से लायी जाने वाली बहु से कभी पुछा नहीं जाता की उसके खुद के क्या अरमान है? क्या चाहती है वोह पति से ? सास से क्या अपेक्षाएं  है?

          अब् वक़्त सोचने का नहीं अमल में लाने का है। जिस तरह आप आरती की थाली लेकर बहु का स्वागत करते है बस उसी  रूप में कीजिये अपनी खुशियों का भी स्वागत। नयी नवेली बहु को न सिर्फ अपने घर में वरन अपनी ज़िन्दगी, अपने मन में जगह दीजिये। उससे आते ही बदलने की अपेक्षा न रखते हुए खुद को उस के साथ बदल दीजिये। बहु को  आज़ादी और जगह दीजिये , हुक्म की जगह सलाह लीजिये। नए ज़माने की नयी सोच को अपनाकर न सिर्फ ज़माने के साथ वरन नए ज़माने में अपनी जगह बनाकर रखे।  बहु आपको अपना बनाये इसके लिए जरूरी है की आप उसे खुले दिल से अपनाये। वह माँ जो आज सास है उसे कभी नहीं भूलना चाहिए की वह भी बहार से अर्थात दुसरे परिवार से आई हुई है। जैसे आज यह आपका घर है वैसे ही बहु को महसूस होना चाहिए कि  यह उसका भी घर है।

रिश्तों  और खेती में 1 ही समानता है - " जो आप बोओगे , वही आप काटोगे . " जो यह  बात हमे बचपन में सिखाते है वही बड़े इसे भूल जाते है।   नए सदस्य से आप जैसा व्यवहार करेंगे आने वाले समय में आपको वही वापस मिलेगा और वह भी सूद समेत।   किसी को भी नए माहौल  को अपनाने में वक़्त लगता है उसे यह वक़्त दीजिये, धैर्य  और प्यार के साथ। फिर देखिये किस तरह करती है खुशियाँ आपकी दुनिया रौशन  !!

एक शब्द तुम कहो , चार हम कहें
एक बात पर तुम अडे रहो ,
तो फिर बहस हम भी करें ,
कितना आसान है ना रिश्तो को तोड़ना ,
जो है काम अति मुश्किल वह है जोड़ना ।

वक्त होता नही कभी , निकालना पड़ता है....
थोडा सा ध्यान रिश्तो पे डालना पड़ता है ...

सीचना होता है प्यार से, पर करता कौन है ??
रिश्ते निभाने की बात आजकल सोचता कौन है ???






"अधिकार और कर्तव्य " पर कुछ सवाल अगले अंक में। 


धन्यवाद !!


Vaisshali :)

6/25/2012

मिलन


जो पुछा तूने  रात का फ़साना , 
सुर्ख लाल चेहरे से शर्मना 
जो देखा होता तुने मुखड़ा मेरा ,
 आँखे बता देती फ़साना सारा!


वो बिखरी जुल्फे वो बिखरा टीका,
वो अंगडाई ,मन बहका रीझा
वो सिलवटे  देख चादर की,
 बयां हो गयी कहानी प्यार की!


अब तक छाया  सरूर है,
यूँ लिपटना तेरा कसूर है
वो धीरे से चुम्बन माथे का,
 बिन मौसम बरसातो सा!


अधरों से अधरों का मिलना,
दिलों  में महकते फूल खिलना
वो तेरा मुझे बाहों में जकड़ना,
वो मेरा हाथ छुड़ाना झगड़ना!


वो झूठ-मूठ का ग़ुस्सा मेरा,
मुझे मानाने का सलीका तेरा
वो वादे, वो कसमे,वो प्यार तेरा,
बिछ-बिछ जाना राहो में मेरा!


इतना प्यार ना  करो मुझसे
रह न पाऊँगी बिछड़ तुमसे
ये पल रहेंगे याद सदा,
यूँ ही रहना बनकर मेरा
इस प्यार पर न कोई पहरा है,
ये रिश्ता हमारा बहुत गहरा है !!



व्रत , स्त्रियाँ और औचित्य

भारत  रीति - रिवाज , संस्कारों  का देश माना  जाता हैं . यहाँ बचपन से ही धर्म  और धार्मिकता के बारे में सिखाया जाता है . कुछ सीखे तो सभी के लिए समान  होती हैं पर कुछ सीखे लिंग भेदी  भी होती हैं , अर्थात लड़के व  लडकियों के लिए अलग -अलग। बड़ो का आदर करना, माँ-पिताजी का कहना मानना  इत्यादि तो सभी को सिखाया जाता है परन्तु घर का काम, रीत-रिवाज़ ,पूजा-पाठ ,व्रत-त्यौहार  इत्यादि सिर्फ लडकियों को सिखाया जाता है, ऐसा क्यों ??
                  हम सदियों से चली आ रही हर रीत का अक्षरत: पालन करते चले आ रहे है, बिना सोचे या जाने कि  आज के दौर में क्या इनका औचित्य है ??
                                 सैकड़ो वर्ष पहले यह व्यवस्था थी भारतीय समाज में कि  पुरुष सिर्फ घर के बाहर  का काम देखते थे और स्त्रियाँ  घर के अन्दर घर, परिवार और बच्चों की देखभाल करती थी।  पुरुष न सिर्फ काम करते थे बल्कि अधिकतर उन्हें परदेश जाना पड़ता था। आज की तरह सुविधओं  का आभाव होने से कठिनाइयों का सामना बहुत ज्यादा करना पड़ता था।  चूँकि स्त्रियों के जीवन का आधार पुरुष ही हुआ करते थे इसलिए उनके जाने के बाद उन्हें उनकी चिंता सताती थी,बस यहीं से व्रतों  पूजा-पाठ  का सिलसिला शुरू हुआ ऐसा माना जाता है। इससे एक तो खाली  समय  का सदुपयोग होता था,अनेको  स्त्रियाँ मिलती,साथ पूजा करती,गीत गाती, मन बहल  जाता था। दूसरा, ध्यान कहीं और लगने से चिंता भी कम होती थी।
                      पुरुष तो परदेश में दिन-रात परिवार के लिए कड़ी मेहनत करते और अधिक से अधिक धन कमाने में लगे होते थे। उन्हें उस वक़्त न तो फुर्सत थी ना जरुरत थी इन व्रतों  को करने की।
 बात ये नहीं कि  यह' सही है या गलत ? उस ज़माने के लिए तो सही मानी भी जा सकती है,किन्तु सोचना यह है कि आज के बदलते  ज़माने के साथ इनका वजूद कितना उचित है ?

आज जहाँ स्त्रियाँ न सिर्फ घर की देहलीज लांघ काम करने चल पड़ी है बल्कि हर क्षेत्र में कंधे से कंधा मिला पुरुषों  के साथ खड़ी  है, बल्कि कुछ कदम आगे ही खड़ी  मिलेगी। ऐसे में क्या ये व्रत उन्हें उनकी कमजोरी का एहसास नहीं दिलाते ? जब बात बराबरी की है तो साल में कई   दिन अपने आप को कमतर क्यों साबित करती है? क्या कोई पुरुष स्त्रियों के लिए व्रत रखता है? तो स्त्रियों को आज उनके लिए व्रत रखने की जरुरत क्या है? क्यों कोई पुरुष नहीं चाहता कि  उसकी माँ,पत्नी और बेटी स्वस्थ्य व  दीर्घायु हो?
                              दूसरा पहलु यह भी है कि  क्या सचमुच व्रत करने से बेटे,पति की आयु बढती है? और यदि यह सच भी है तो क्या यह व्यवस्था भगवन ने सिर्फ अलग से भारत देश में रहने वाले पुरुषो के लिए की है? क्या विदेशो में रहने वाले पुरुषो को इन व्रतों  की जरुरत नहीं? इससे तो यह स्पष्ट होता है कि  भारतीय पुरुष इतने कमजोर है या भगवन की नज़रो में इतने कमतर है जिसके लिए उन्हें अपने स्वास्थ्य व  आयु के लिए स्त्रियों के व्रतों  पर निर्भर होना पड़ता है।
                              आज के दौर की पढ़ी लिखी महिलओं को कम से कम अंध-रीतियों में शामिल होने से पहले उनके औचित्य के बारे में जरूर सोचना चाहिए। अपने मन के उपरांत  सिर्फ हमारा धर्म या समाज के कहने से कुछ भी करने से बचना चाहिए। वहीँ करे जिसे आपका दिल और दिमाग दोनों स्वीकार करता हो।

5/23/2012

ISHARAA

इशारा 


इकरार - इन्कार है नैनों  की जुबान 
दिल की गहराइयों में है  इसकी लगाम !

आँखों  को पढ़  लो जुबां  हम  ना  खोलेंगे 
दिल  को  टटोल  लो इशारों  से ना  बोलेंगे !

खुद  समझ  जाते  तो  ना  तरसते 
कुछ  कह  जाते  तो हम  भी  बहकते 
कुछ  कहा  होता तो  हम  जान  जाते 
तेरी  मोहब्बत  को पहचान  जाते !

खुदा तो देता है अनगित  इशारे 
काश  ! के तुम उनको आवाज़  दे पाते !!

                                                                 vaisshali 

4/08/2012

Bewafai ka sila...........



karke bewafai bhi tu khush rahe
har gamm har judai mei bhi tu khush rahe
Rabb na de tujhe koi saza.
meri maut ke din bhi tu khush rahe!!

meri aankho ke aansu teri muskaan ban jaaye
tujhe koi mile jene ki wajah ban jaye
mere toote khawab teri zindagi ban jaye
meri yaado ka nisaan na parchai ban jaye!!

mei tanha hoon to kya hua,
teri zindagi mela bann jaye
mera sath choota to kya hua
tujhe sath duja mil jaaye
mere vaade poore na ho koi gamm nahi
tere vaado ka mahal bann jaye..
mere zakhm nasoor hi sahi...
tere zakhmo ko marham mil jaye !!

tune dil mera toda to kya hua??
tujhe be-panaah mohabbat mil jaye !!
tujhe be-panaah mohabbat mil jaye !!

2/17/2012

पहेली

ना लफ़्ज़ो में इंकार ना बातो में इकरार,
क्या है उन्हे नहीं प्यार पे एतबार ?
है हमको अटूट  विश्वास उन पर 
उन्हे नहीं  एतबार खुद पर
पहले दबे-दबे फिर साफ लफ़्ज़ो में
      किया इज़हार हमने
सरे से  नकार दिया खुद
      अपना वजूद तुमने
कर गुजर जाएंगे तुम्हारे लिए कुछ भी
ठहरो ना, कुछ कदम चलो तुम भी ।
एक कड़ी नक्षत्र है बीच हमारे,
बीच होकर भी वही है किनारे
मै नहीं कहती मुझसे एक़रार करो
कुछ  तो कहो कुछ बात करो इंकार करो
यह चुप्पी तुम्हारी अब बर्दाश्त नहीं होती
नश्तर सी चुभोती न जीने देती न मरने देती !!


पर्दानशी

नैनों की जुबां , हाल - ए - दिल 
कैसे बायाँ करू सामने  उनके 
कभी जुबां  तो कभी नैन
    साथ नहीं देते 
बनके गुमनाम पाया उनको 


तो लगा -


गुमनामी  की शख्शियत
है असली शख्शियत
होके पर्दानशी , हमने ज़िंदगी  पा ली