4/15/2013

विचार - विमर्श (चर्चा ) या बहस ??

                                                              
हम भारतीय लोग बहुत बोलते है। अन्जान  भी कुछ ही पलों  में जान-पहचान वाले बन जाते हैं। हम कभी झिझकते नहीं कुछ भी पूछने से, चाहे वह रास्ता ही क्यों ना  हो, और सुझाव देने को तो तत्पर रहते है। किसी को भी यदि हम बिन माँगे ,मुफ्त में कुछ देते है तो वह  है सलाह। हर एक भारतीय के पास खुद की समस्या के अलावा दूसरी हर एक समस्या का कोई न कोई हल तो जरूर है।  बस किसी ने समस्या बताई नहीं और हम सलाह / सुझाव देना शुरू कर देते है, सामने वाले ने आपसे माँगा हो या न माँगा हो , इस से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह हमारे व्यवहार का अभिन्न अंग है। 

              वैसे देखा जाये तो बात-चीत के सही तरीको से भी हम अक्सर अनजान पाए गए है।  बात-चीत के कई भाग होते है जिनसे हम स्कूल - कॉलेज में रूबरू तो होते है किन्तु रोज़िन्दा जीवन में बात करते वक़्त भूल जाते है। जैसे - साधारण बात-चीत, विचार-विमर्श करना, बहस  इत्यदि। हमे  ये  शब्द पता है और उनके अर्थ भी किन्तु रोज़मर्रा में हम बात करते वक़्त यह फर्क नहीं रख पाते कि  कब क्या होना चाहिए। साधारण सी बात-चीत कब बहस में परिवर्तित हो जाती है हमे पता ही नहीं चलता। 
       
                  विचारों  का आदान-प्रदान या विचार-विमर्श करना हमारे लिए संभव ही नहीं है,क्यूंकि हमे सही मायनो में यह तक नहीं पता कि  विचार-विमर्श करना है क्या? यह बहुत समझने वाली बात है, हम बहुत बार कहते तो जरूर है कि  चलो विचार-विमर्श ( Discuss) करते है , पर क्या हम कर पाते है ?  विचार-विमर्श करना  अर्थात " किसी एक विषय पर अपने- अपने विचार प्रस्तुत करना। " ज्ञान में निहित सक्षम विवेचना ही चर्चा है। " अर्थात अपने ज्ञानपूर्ण विचारो की ठोस प्रस्तुति। मकसद अनेक हो सकते है जैसे- किसी समस्या के समाधान पर पहुचना, अपने विचारो से दूसरो को अवगत कराना साथ ही दूसरो के विचारो को जानना, उस विषय को गहराई से जान पाना,  एक अच्छा  श्रोता बनने की कला सीखना  इत्यदि।  

                  बात वही आ जाती है कि  क्या हम ऐसा कर पाते है ? किसी भी विषय पर या तो हम सहमत होते है या असहमत। सहमत हुए तो अक्सर हम हाँ में हाँ मिलकर खानापूर्ति करने की कोशिश करते है , तो भी विचार-विमर्श नहीं हो  पाता। अगर हम असहमत हुए तो फिर विचार-विमर्श संभव ही नहीं है, क्यूंकि तब हम तर्क-वितर्क  पर उतर आते है, और अपनी ही बात को सही साबित करने में जुट जाते है और भूल जाते है की क्या करने बैठे थे। तब हमारा एक ही मकसद हो जाता है कि  कैसे भी , तर्कों से या कुतर्को से  बस अपनी बात सही साबित कर दे। तब विचार विमर्श , बहस का रूप ले लेती है। हम सामने वाले तो पूरी बात कहने का मौका ही कहाँ देते है ? बीच में ही उसकी बात काट कर अपने विचार थोपने की कोशिश करने लगते है।   हर बात पर बहस करना हमारी आदत सी बन चुकी है। हम हमेशा यही सोचते है कि - बस मैंने जो कहा वह सही , बाकी सब गलत।  हर जगह हमारा अहम् आड़े आ जाता है और हम इसके पार कभी सोच ही नहीं पाते है। साधारण सी बात-चीत में भी अक्सर ऐसा ही होता है। 

          हमें बहुत उतावलापन न दिखाते हुए, सामने वाले की बात को पूरी तरह सुनना चहिये, फिर अपने विचारो  से सबको अवगत कराना उचित होता है। जरूरी नहीं कि  वह आपसे हमेशा ही सहमत हो क्यूंकि' हर एक का अपना व्यक्तित्व और दिमाग है, जो आपके अनुसार नहीं उसके खुद के अनुसार ही चलेगा। बस सुनिए,फिर कहिए और बहस को अपनी आदत न बनाइये और फिर फर्क देखिये। :)
                                This is My 51th Post :)

4 comments:

Anurag said...

9/10
better :-)

Vaisshali said...

Thanks Anurag ! :)

anuj kumar said...

आपने जो शीर्षक लिखा बहुत ही मज़ेदार हैं क्युकी जब हम विचारो की प्रधानता की बाते करते हैं तब विचार विमर्श करते हैं। और जब हम बेतुक बात करते हैं तब बहस का रूप भी लेती हैं

Vaisshali said...

bilkul Sahi ... Thanks Anuj ji