5/30/2015

वो ज़ज्बात

वो निगाहें देखा करती थी 
हर रोज़, वही जगह, वही वक्त 
देखा था मैंने 
तेज कदमों से चलते हुए, 
आँखो के कोने से, 
हर रोज, वही जगह वही वक्त 
मुस्कुरा देती थी मैं 
हर रोज़ का ये सिलसिला 
न उसने तोड़ा न मैनें 
निगाहें ढूंढा करती थी 
देखकर ही आत्मा 
तृप्त हो जाया करती थी 
न उसने कुछ कहा न मैनें
ज़प्त कर लिया जज्बातों को 
आँखों के रास्ते, दिल की गहराई में 
बाँध दी ज़माने की जंजीर 
लगा दिए चुप्पी के ताले 
बरसों कैद रहे ये ज़ज्बात 
दिल के तहखाने में 
वक्त की परतें चढ़ती चली
धुंधला गई तस्वीरें 

तूफान यूँही चले आए 
सब कुछ उड़ा ले गए 
परतें क्यूँ फिर खुल गई 
जज्बातों की आँधी फिर चल गई

काश! ये न हुआ होता 
भरम में रह रहे होते 
काश! सच्चाई न आती सामने 
खुशफहमी में मुस्कुरा रहे होते

थम  गए हैं ज़ज्बात 
न रही पहले सी वो बात 
खो गए हैं अल्फाज़ 
फिर भी न जाने क्यूँ 
लिए हूँ खड़ी हाथों में वो रात !! 

वैशाली 
30/05/2015 
1:40 मध्य रात्रि..