10/17/2014

मुझको अपना बना लो तुम

प्यार बहुत है मुझको तुमसे 
तुम भी बस यूं ही प्यार करो 
तन से सुन्दर है मन मेरा 
रूह से इसका एहसास करो । 

फिर क्यों चाहते हो तन मेरा 
जब कण -कण रोम-रोम है तेरा । 

क्या प्यार मेरा तृप्त नहीं करता ?
क्या नहीं तुम्हारी रूह को छूता ?


पहले चाह  बस प्यार की थी 
हाँ  कहते ही बदल गया सब

अब चाहो तुम तन मेरा 

पा कर फिर क्या चाहोगे ?

मिल जाएगी तृप्ति तब भी ?
फिर और क्या मुझसे पाओगे ?

हर चाहत को पूरा करके 
कैसे मानू बदल न जाओगे ?

क्या धरा है इस तन में ?
छू  लो मेरी आत्मा को तुम 

मैं तो वैसे भी हूँ तुम्हारी 
यूँ ही मेरे हो जाओ तुम 

जिस दिन यह तन ढल जायेगा 
जिस दिन यह मिट्टी में मिल जायेगा 

उस दिन तुम एहसास करोगे 

दिन रात बातें याद करोगे 

मेरी आवाज़ को तरस जाओगे 
बुला बुला तुम थक जाओगे 

क्यूँ तरसना चाहते हो तुम 
प्यार में पूर्णता पा लो तुम 

तन से न करो प्यार इतना 
रूह को रूह से मिला दो तुम 
मुझको अपना बना लो तुम 
बस! मुझको अपना बना लो तुम  ॥ 

10/03/2014

बड़ी हो गयी

जैसे  ही  बचपन  की  याद  आ  गयी,
चेहरे  पर  मुस्कान  छा  गयी 

काश  ! के  मैं   बड़ी  न   होती 
छोटी सी, बचपन में ही रहती 

बड़ो के कहना मानती रहती 
सही गलत न खुद पहचानती 

सबकी ख़ुशी में ख़ुशी ढूंढती 
झूठे  बहलाने  पर बहल  जाती 

सबकी प्यारी बनकर रहती 
अच्छी बच्ची फिर कहलाती 

ना  जाने क्यूँ  मुझमें समझ आ गयी 
सही गलत की पहचान पा गयी 

झूठे बहलावे से बहलती नहीं हूँ मैं 
मुखौटों  का सच अब जानती हूँ मैं 

शायद अब मैं  बड़ी हो गयी 
इसलिए मैं  अकेली हो गयी 

इसलिए मैं  अकेली हो गयी  !!