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7/24/2014

तुम जो कहो मान जाउंगी




माना  मुझसे आपको प्यार नहीं ,
इस लफ्ज़ पर भी ऐतबार नहीं ?

नहीं क़द्र है मेरी आपको 
क्या भावनाओं का भी ख्याल नहीं ?

कब कहती हूँ इज़हार करो ,
मेरे इज़हार का तो सम्मान करो 

प्यार को प्यार से न लौटाओ,
पर दोस्ती पर न वार करो 

दिल तुम्हे चाहता है बचपन से,
पहली मोहब्बत का तो मान करो 

खोलो न राज़-ए -इश्क़ अपने,
पर मेंरी बातों पर न शक करो 

बदले में नहीं माँगा प्यार मैंने ,
पर यूँ मौन न धारण करो 

फिर कहती हूँ आज तुमसे 
एक इशारे से जान जाउंगी ,
मेरी बातें न सुनो लेकिन ,
तुम जो कहो  मान जाऊँगी ll 

तुम जो कहो मान जाऊँगी  ........................................ !!

4/08/2013

लेना - देना

                                         
  
लेना और देना दुनिया की बहुत पुरानी  रीत है। कहा जाता है कि - यह दुनिया, रिश्ते-नाते, दोस्ती-यारी सभी कुछ एक व्यापार की तरह ही है। जहाँ एक हाथ ले और एक हाथ दे , वाली बात होती है। कोई भी रिश्ता लम्बे समय तक एक तरफ़ा नहीं चल सकता है। प्यार भी एक तरफ़ा अपना वजूद खो देता है। प्यार की आग भी दोनों तरफ बराबर लगी हो , तब ही सही मन गया है।  पर क्या यह लेन-देन  हमेशा समान पैमाने पर ही होता है क्या ?

  क्या लेना और देना जरूरी है ? आपको किसी ने कुछ दिया , तो क्या आप वही उसको लौटाए , यह जरूरी है ? हम चीजों  का , सामान का व्यापार तो करते ही है, साथ ही साथ अनमोल से रिश्तों  का भी व्यापर कर बैठते है। रिश्तो में भी मतलब और फ़ायदा ढूंढते है। जिस से जितना फ़ायदा उस से उतना ही रिश्ता। 
    कुछ लेन -देन  रिश्तो  को बनाये रखता है तो कुछ उनके टूटने की वजह बन जाता है। जरूरी और समझने वाली बात यह है कि - हम खुद को कितना जानते है ? दिखावा करते वक़्त तो हम अपने आप को सबसे उपर, प्रत्येक रूप से, दिखाते है, पर जब आचरण करने की बात है या फिर झगडा करने की तो हमारा सही चरित्र सामने आ जाता है।  लेन -देन  का सबसे विकृत स्वरुप देखने मिलता है तो झगड़ो मे… क्युंकि तब होता है - अपशब्दों ( गालियों) का लेन  -देन। 
        असली लडाई/ झगडा शुरू ही होता है अपशब्दों से। किसी ने आपको अपशब्द कहे और हम शुरू हो गए लड़ना कि - " गाली क्यों दी" ? पर मेरा प्रश्न यह है कि  मन उसने अपने चरित्र के हिसाब से गाली दी ,पर आपने उस से "ली " क्यों ? कोई आपको कचरा या फ़ालतू सामान मुफ्त में देना तो क्या आप ले लोगे ? नहीं ना… !!तो फिर उसके दिए अपशब्द आपने लिए क्यों ? कोई आपको, मान लो कि  "कुत्ता" ( बहुत अधिक बोला जाने वाला अपशब्द) कहे , तो क्या आप बन जाओगे ? यदि अच्छे रूप में "प्रधानमंत्री" कहे तो भी क्या फर्क आएगा? आप वह बन तो नहीं गए ना?
फ़िर ..?? सोचने वाली बात है…. 

     भगवन ने आपको दो कान और उन्ही दोनों कानो के बीच दिमाग क्यों दिया है ?? कभी सोचा है आपने ?? 
   कोई अच्छा कहे तो हम तुरंत प्रसन्न हो जाते है और बुरा कहते ही क्रोधित , इसका मतलब तो यही हुआ कि  हम बिना अपने दिमाग का इस्तेमाल किये सब कुछ बस लेने में ही विश्वास  करते है। अच्छा तो उसी पल लौटते नहीं किन्तु बुरा , खुद नीचे गिरकर भी , उसी पल देने में देरी नहीं करते। अच्छा देने में यह आतुरता कहाँ चली जाती है? 
      हमे भगवन ने दोनों कानो के बीच दिमाग इसलिये दिया है कि  -हम एक कान से सुने, फिर दिमाग का इस्तेमाल करके अच्छी बातों  को रखे और बाकि सब दुसरे कान से निकाल दे।  " गवाँर  की गाली - हँस  कर टाली ". मेरे पिता द्वारा बचपन में सिखाया हुआ यह पाठ , आप यकीन मानिए , ज़िन्दगी में मेरे बहुत काम आया है। जब भी कोई अनजान या नज़दीकी  व्यक्ति कोई चुभती बात कह दे और वह बात आपकी शान्ति भंग कर दे और आप लड़ना भी न चाहे तो बस इसी वाक्य को ध्यान में लायें और फिर देखे चमत्कार , आपकी शान्ति वापस आ जाएगी। 
         

3/25/2013

प्यार और सम्मान की सच्ची अधिकारिणी

                                             
सदियों से चली आ रही परंपरानुसार कहा ही गया है कि "प्यार और सम्मान पर पहला हक परिवार के बुजुर्गो का है। हाँ ! यह सत्य है , पर ज़िन्दगी जैसे - जैसे आगे बढती है हमारे रिश्ते और विस्तृत होते चले जाते है। हर रिश्तो के अपने मायने है और उनको निभाने के तौर तरीके भी विभिन्न है। जैसे - माता-पिता से, पत्नी से, बहिन से,पति से दोस्तों से, रिश्तेदारों से ..इत्यादि। 

         हमारे देश में रिश्ते निभाने में विश्वास किया जाता है, हर पीढ़ी आने वाली पीढ़ी को यह जरूर सिखाने की कोशिश करती है। हर रिश्ते की अपनी अलग सीमाएँ  होती है जिन्हें लांघना उचित नहीं होता है। इन अनेको रिश्तो में अपने अलग रंग और अलग भावनाएँ होती है। हमारे देश में तो दुश्मन को भी एक रिश्तेदार की तरह मानकर , दुश्मनी का रिश्ता भी बखूबी निभाया जाता है। कहीं रिश्ता सिर्फ सम्मान'का, कहीं दोस्ती का, कुछ खट्टे-मीठे , तो कुछ प्यार भरे होते है। कुछ रिश्ते ऐसे होते है जिन्हें आजतक कोई समझ नहीं पाया है, और उसे किसी एक भावना के साथ भी जोड़ा नहीं जा सकता है, जैसे की ..बहु का ससुराल वालो से रिश्ता, या दुसरे शब्दों में कहे तो " सास-बहु" का रिश्ता। 

         एक स्त्री जो बेटी, बहिन बनकर पैदा होती है, बड़ी होकर प्रेयसी, पत्नी, बहु बनती है और फिर माँ। इन सभी रिश्तो को वह बखूबी निभाती है। जीवन के हर मोड़ पर खुद को सबके पीछे रखती है। फिर भी आज तक वह उस सम्मान की अधिकारिणी नहीं बनी जो उसका हक है। 

      एक लड़की को जन्म के बाद उम्र के हर पड़ाव पर उससे प्यार और सम्मान देना सिखाया जाता है, पर यह नहीं सिखाया जाता कि  वह भी उसी प्यार और सम्मान की समान हक़दार है। जब वह बहु बनकर ससुराल में कदम रखती है तो उसे महसूस कराया जाता है की उसका खुद का तो कोई सम्मान है ही नही । नाजो से पली बढ़ी वही लड़की का जीवन, मात्र सिन्दूर लगा लेने और मंगलसूत्र पहन लेने से, पूरी तरह बदल जाता है। परायो के बीच रहकर उसे खुद को उनका अपना साबित करना होता है। परिवार का हर व्यक्ति उससे प्यार और सम्मान की भरपूर आशा रखता है , पर क्या कभी उसे भी उतना ही मिल पता है ??

           देखा और सोचा जाये तो सही मायनो में तो प्यार और सम्मान की पहली अधिकारिणी घर की बहु होती है। आप उसे ब्याह कर, गाजे बाजे के साथ अपने बेटे और पूरे परिवार की ज़िन्दगी में लाते है, बहुत प्रेम से उसका गृह प्रवेश करते है।  आप तो सभी अपनों के बीच है, एक वही अकेली होती है जो कि  परायो के बीच होते हुए भी उन्हें अपना समझती है। ऐसे में ससुराल वालो का कर्तव्य होता है कि  उस से आशा न रखते हुए , उसे प्यार और सम्मान दे।  पहले देने का सोचे फिर पाने का। कहा ही गया है कि  " जो हम बोते है , वही हम काटते (पाते) है। 

    एक लड़की का बहु के रूप में दूसरा जन्म सा होता है क्यूंकि वह दुसरे परिवार में जाकर नए सिरे से उनके रीति -रिवाज़ , रस्में , तौर-तरीके इत्यादि सीखती है। वह एक कोरे स्लेट की भांति  होती है , जो उसे सिखाया जाता है वही वह करती जाती है। उससे हमेशा कर्तव्यो में बेटी की तरह उम्मीद रखी जाती है और व्यवहार एक बहु ( परायी लड़की) की तरह किया जाता है , आप बबूल बो कर , आम की उम्मीद कैसे कर सकते है ?? यदि वह आपका व्यवहार आपको ही लौटाती है तो क्या गलत करती है ?   इस तरह वह बढती दूरियों में एक अलग घर या अपने अलग आशियाने का सोचती है तो कुछ गलत नहीं करती है। 
      
           प्यार और सम्मान का पहला अधिकार पाने की अपेक्षा रखने वालें , पहले उसे देना तो सीख ले। जब तक आप उसे पूरे दिल से , सम्मान से पहले दिन से ही प्यार से नहीं अपनाएंगे तो यह दूरियां कभी मिट नहीं सकेंगी। यदि आप एक कदम उसकी और बढ़ाएंगे तो यक़ीनन वह चार कदम बढ़ाएगी क्युकी यही स्त्री है, उसका व्यक्तित्व है, भगवन ने उसे ऐसा ही बनाया है। 

                बहु को बेटी बनाकर तो देखिये, दूरियों का नामोनिशान तक नहीं होगा और वह एक नहीं दो परिवारों की बेटी बन जाएगी। प्यार और सम्मान के अधिकार की लडाई ही कहाँ रह जाएगी? 

" जन्म-जन्मो से वह बस कर्तव्यो को पहचानती है,
  प्यार और सम्मान मिले ,अधिकारों को कहाँ जानती है ?? "
     

1/09/2008

प्रेम : भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष में

प्रेम : भारतीय संस्कृति के परिपेक्ष में

आज भी भारतीय समाज अपने दृष्टिकोण को व्यापक नही कर सका है या यू कहे की हमने अपना एक दायरा बना लीया है. मस्तिष्क से कभी उस से आगे सोचने की ज़ुर्रत भी नही कर सकते है. मेरे मन में प्रेम को लेकर हमेशा से एक सवाल रहा है की प्यार में इतना बवाल क्यों? प्रेम भारतीय संस्क्र्ती का अटूट हिस्सा है, हमारे धर्म में प्रेम को सर्वोपरी माना है, फिर समाज में क्यों नही ? क्यों हर व्यक्ति चाहता है की उसका प्रेमी,प्रेम करे पर उस के हिसाब से . प्रेम वह है जहाँ कहा जाता है की ..उससे खुला छोड़ दो, यदी वह वापस तुम्हारे पास आता है तो वह हमेशा तुम्हारा है, और नही तो वह कभी तुम्हारा था ही नही..... पर इसे स्वीकार कोई नही करता है..क्यों हर भारतीय नारी पूजा तो सबसे पहले गणेशजी की करती है पर  पतिकी कामना हमेशा राम जी जैसे पुरुष की करती है.
सभी स्वार्थी है सिर्फ अपने बारे में सोचते है..''कृष्ण'' प्रेम को सही ठहराया जाता है वही ''बटुक्नाथ'' को गलत।

पर इस स्थिति की जिम्मेदार एक स्त्री ही है, यदी वह साक्षर हो और अपने पैरो पर खड़ी हो तो क्या फर्क पड़ता है बटुक्नाथ जैसे पुरुष का जींदगी में होना या न होना..अपने आप में साक्षर होना बहुत बड़ा बल है , फिर जुली, मिली कोई भी आये क्या फर्क पड़ता है? स्त्री स्वंतंत्राता की मिसालहै आज के दौर की फिल्म.." कभी अलविदा कहना " . हर स्त्री को अपने फैसले लेने का पूरा अधीकार है, उसकी ज़िंदगी उसकी है ..कोई और उसे नही चला सकता.. आज यह फिल्म पुरुष प्रधान समाज को बहुत बुरी ही लगेगी..पर वक़्त यही आ रहा है जहाँ पुरुष के होने न होने का बहुत ज्यादा असर किसी स्त्री पर नही होगा अर्थात् हर स्त्री अपनी ज़िंदगी, प्यार की तारनहार होगी न की उसका पति, पिता या भाई.....अपने प्रेम को स्वयम ही चुंनेगी .........