3/07/2013

आधुनिक

           
बदल रहा है दौर सारा ,
सब कुछ है बदला -बदला सा ,
नया ज़माना नए है रंगरूप ,
नया चलन है बहुरूप !

बोल चाल का ढंग बदला,
सोच विचार का रूप बदला,
क्या बदला है स्वरुप माँ का?
क्या बदली है ममता उसकी ?

क्यों न ममता आधुनिक हो जाये ?
क्यों अब भी रोये-चिल्लाए ?
क्यों वो दे कुर्बानी खुद की ?
क्यों वो हरपल नीर बहाए ?
क्यों न वो आज़ाद हो जाये ?

संतान अब तक बदली बदली 
क्यों न अब ममता बदल जाये ?
संतानों की हर एक गलती पर 
क्यों न अब वो सबक सिखाए ?

मुख मोड़ती  थी संतान अब तक,
क्यों न माँ यह चलन अपनाये ?
हो जाये गर स्वार्थी माँ तो,
क्या हमे यह स्वीकार होगा ?

आधुनिकता के इस दौर में ,
माँ की है वही कहानी।
बदला कहाँ है ज़माना यारों 
ममता अब भी है पुरानी।।

लगता है मैं  बदल रही हूँ ...
क्या मैं भी आधुनिक हो रही हूँ ...?? 



2 comments:

anuj kumar said...

दिल आत्मा के यथार्त की बरक़रारता को पेश किया आपने। बहुत बढ़िया ऐसा ही प्रयाश करो

Vaisshali said...

Thanks Anuj ji